(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.266. अध्यायः 266
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
युधिष्ठिरेण भीष्मंप्रति धर्मप्रामाण्याक्षेपः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच। 12-266-0x(6284)(75896)
सूक्ष्मं साधु समादिष्टं भवता धर्मलक्षणम्।
प्रतिभा त्यस्ति मे काचित्तां ब्रूयामनुमानतः॥ 12-266-1(75897)
भूयांसो हृदये ये मे प्रश्नास्ते व्याहृतास्त्वया।
इदं त्वन्यत्प्रवक्ष्यामि न राजन्निग्रहादिव॥ 12-266-2(75898)
इमानि हि प्राणयन्ति सृदन्त्युत्तारयन्ति च।
न धर्मः परिपाठेन शक्यो भारत वेदितुम्॥ 12-266-3(75899)
अन्यो धर्मः समस्थस्य विषमस्थस्य चापरः।
आपदस्तु कथं शक्याः परिपाठेन वेदितुम्॥ 12-266-4(75900)
सदाचारो मचो धर्मः संतस्त्वाचारलक्षणाः।
साध्यासाध्यं कथं शक्यं सदाचारो ह्यलक्षणः॥ 12-266-5(75901)
दृश्यते धर्मरूपेण ह्यधर्मं प्राकृतश्चरन्।
धर्मं चाधर्मरूपेण कश्चिदप्राकृतश्चरन्॥ 12-266-6(75902)
पुनरस्य प्रमाणं हि निर्दिष्टं शास्त्रकोविदैः।
वेदवादाश्चानुयुगं ह्रसन्तीतीह नः श्रुतम्॥ 12-266-7(75903)
अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरे परे।
अन्ये कलियुगे धर्मा यथाशक्ति कृता इव॥ 12-266-8(75904)
आम्नायवचनं सत्यमित्ययं लोकसंग्रहः।
आम्नायेभ्यः पुनर्वेदाः प्रसृताः सर्वतोमुखाः॥ 12-266-9(75905)
ते चेत्सर्वप्रमाणं वै प्रमाणं ह्यत्र विद्यते।
प्रमाणं च प्रमाणेन विरुद्ध्येच्छास्त्रता कुतः॥ 12-266-10(75906)
धर्मस्य क्रियमाणस्य बलवद्भिर्दुरात्मभिः।
यदा विक्रियते संस्था ततः साऽपि प्रणश्यति॥ 12-266-11(75907)
विद्मश्चैनं न वा विद्मः शक्यं वा वेदितुं न वा।
अणीयान्क्षुरधाराया गरीयानपि पर्वतात्॥ 12-266-12(75908)
गन्धर्वनगराकारः प्रथमं संप्रदृश्यते।
अन्वीक्ष्यमाणः कविभिः पुनर्गच्छत्यदर्शनम्॥ 12-266-13(75909)
निपानानीव गोभ्याशे क्षेत्रे कुल्ये च भारत।
स्मृतो हि शाश्वतो धर्मो विप्रहीणो न दृश्यते॥ 12-266-14(75910)
कामादन्ये भयादन्ये कारणैरपरैस्तथा।
असन्तोऽपि वृथाचारं भजन्ते बहवोऽपरे॥ 12-266-15(75911)
धर्मो भवति स क्षिप्रं विलोमस्तेष्वसाधुषु।
अथैतानाहुरुन्मत्तानपि चावहसन्त्युत॥ 12-266-16(75912)
महाजना ह्युपावृत्ता राजधर्मं समाश्रिताः।
न हि सर्वहितः कश्चिदाचारः संप्रवर्तते॥ 12-266-17(75913)
तेनैवान्यः प्रभवति सोऽपरं बाधते पुनः।
दृश्यते चैव स पुनस्तुल्यरूपो यदृच्छया॥ 12-266-18(75914)
येनैवान्यः प्रभवति सोऽपरानपि बाधते।
आचाराणामनैकाग्र्यं सर्वेषामेव लक्षयेत्॥ 12-266-19(75915)
चिराभिपन्नः कविभिः पूर्वं धर्म उदाहृतः।
तेनाचारेण पूर्वेण संस्था भवति शाश्वती॥ ॥ 12-266-20(75916)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि षट्षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 266॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-266-2 निग्रहात् कुतर्काग्रहेण॥ 12-266-9 प्रसूताः सर्वतोमुखा इति ध. पाठः॥ 12-266-16 अपि वाचं हसन्त्युतेति ध. पाठः॥ 12-266-20 संस्था मर्यादा॥


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